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धूमधाम से मनाया ल्होसर पर्व

देहरादून। रविवार को राज रानी फार्म, सेवलाकलां, चंद्रबनी, देहरादून में तमु (गुरुंग सामाज) समिति द्वारा गोरखा समुदाय के गुरुंग उपजाति का नव वर्ष तमु ल्होसर पर्व धूमधाम से मनाया गया। गुरुंग व अन्य गोरखा समुदाय के लोगों ने साथ मिल कर च्य ल्हो (पक्षी वर्ष) को विदा तथा खि ल्हो (कुत्ता वर्ष) का स्वागत करते हुए विभिन्न सांस्तिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। आयोजन में विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। आयोजन के मुख्य अतिथि मेघ बहादूर थापा (महाप्रबंधक जल निगम) ने कहा कि गुरूंग अपनी भाषा में स्वयं को तमु कहते हैं जो मूलत: नेपाल के मय-पश्चिम हिमालयी क्षेत्र के निवासी हैं। 
    आज उनमें से बड़ी संख्या में भारत और विश्व के विभिन्न देशों में रह रहे हैं। तमु ल्होसर को तमु संव अथवा गुरुङ पंचाग आरम्भ होने के दिन के रुप में मनाते हैं। प्रत्येक वर्ष विक्रमी संवत् पौष माह के 15 तारीख को गुरुङ समुदाय तोला ल्होसर के रुप में अपने इस उत्सव मनाते हैं। इस दिन पूरे देहरादून के गुरुङ व गोरखा समुदाय के अन्य सभी उपजातियाँ एक जगह में एकत्र हो कर तमु ल्होसर गुरुङ  नव वर्ष के रुप में खुशी और उत्साह के साथ विभिन्न सांस्तिक कार्यक्रम, प्रिति भोज व अन्य प्रतियोगिताओं का आयोजन करते हैं। गुरुङ  समुदाय समय चक्र को 12 वर्षों में विभाजित करते हैं जिसे ल्होकोर कहते हैं, प्रत्येक वर्ष को एक विशेष नाम दिया जाता है जिसे वर्ग ल्हो के नाम से जाता है। गुरुङ भाषा में ल्होसार का शाब्दिक अर्थ है नये वर्ष का आगमन । ल्हो का अर्थ है वर्ष तथा सार का अर्थ है नया। जिस प्रकार से हिन्दू ज्योतिष शास्त्र मे 12 जन्म राशियाँ होती है उसी प्रका गुरुङ ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 12 ल्हो होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक वर्ष को एक विशेष जानवर के नाम से जाना जाता हैं तथा इन सभी को एक क्रमबद्घ तरिके से रखा गया है जिससे सभी एक एक करके प्रत्येक 12 वर्ष के अन्तराल में अपने क्रम में आते रहते हैं। प्राचीन समय में जब पंचाग नही था तो गुरुङ जाति इसी ल्होकोर पद्घति को आयु गणना के लिए प्रयोग करते थे। इस वर्ष 30 दिसंबर से 2017 से खि ल्हो कुत्ता वर्ष का आगमन हो रहा है। गुरुङ ार्म शास्त्रों के अनुसार जिस ल्हो वर्ष में जिस शिशु का जन्म होता है उसका ल्हो च्च्वर्गज्ज् वही होगा। विश्वास किया जाता है कि जिस व्यक्ति का जो ल्हो होगा उसके जीवन में उस ल्हो के प्रतीक पशु पक्षी के प्रति का प्रभाव पाया जाता है। गुरुङ जाति विवाह, मृत्यु व अन्य ाार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते समय ल्हो की सहायता से ही शुभ-अशुभ लगन की गणना करते हैं।
 

Update on: 01-01-2018

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