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पहाड़ की संस्कृति पर मंडरा रहे संकट के बादल

देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की संस्कृति हमेशा सुर्खियों में रहती है। देवभूमि उत्तराखंड की संस्कृति भी हमेशा से समृद्ध रही है। लेकिन, इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि खाली होते पहाड़ और तमाम कारणों से आज हमारी इस समृद्ध संस्कृति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इस सबके बावजूद सरकारी एवं सामूहिक स्तर पर हो रहे प्रयास उम्मीद जगाते हैं। नई सरकार आने के बाद चार दिनों तक संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज के हरिद्वार स्थित प्रेमनगर आश्रम में चली ढोल-दमाऊ कार्यशाला ने उम्मीदों को पंख तो जरूर लगाए, लेकिन आयोजन का उद्देश्य धरातल पर नहीं उतर पाया। बावजूद इसके लोग समझ रहे हैं कि किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति से ही होती है। 
यह भी कहा गया है कि अगर किसी समाज को खत्म करना हो तो सबसे पहले उसकी संस्कृति पर वार करो। इसलिए लोग इसकी अहमियत खूब समझ रहे हैं। तभी तो विभिन्न संस्थाओं की ओर से आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी उत्साहवर्धन करती है।  संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है। जो उस समाज के सोचने विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला आदि में परिलक्षित होती है। 
संस्थागत व व्यक्तिगत स्तर पर बोली-भाषा को लेकर भी कम प्रयास नहीं हुए। अब हमें इनको प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। इतना ही नहीं, लोक संस्कृति की सप्तरंगी छटा देश के कई शहरों के साथ विदेशी धरती पर भी बिखरी। गल्फ देशों के साथ कनाडा आदि कई देशों में प्रवासी उत्तराखंडियों ने आयोजन किया। साहित्य के क्षेत्र में उत्तराखंड की अपनी अलग पहचान रही है। इस वर्ष देहरादून में ही दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकों का विमोचन हुआ।
इनमें से अधिकांश पहाड़ के दर्द यानी पलायन से लेकर कला संस्कृति समेत तमाम विषयों पर केंद्रित रहीं। इसके अतिरिक्त दून में आयोजित हुए पुस्तक मेले में देश-दुनिया के नामचीन साहित्यकारों की पुस्तकों के साथ उत्तराखंड के साहित्यकारों को भी स्थान मिला। वहीं, फिल्म विकास परिषद का गठन होने के बाद भले ही आंचलिक फिल्म निर्माण को अभी प्रोत्साहन न मिला हो, बावजूद इसके लोक संवाहकों के छोटे ही सही, पर प्रयास जारी हैै।
 

Update on: 01-01-2018

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