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इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में 250 करोड़ का घोटाला

 इलाहाबाद। पूरब का आक्सफोर्ड कही जाने वाली इलाहाबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में करोड़ों के घोटाले का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस घोटाले का खुलासा खुद यूनिवर्सिटी के वीसी प्रोफ़ेसर रतन लाल हांगलू ने किया है। हैरत की बात यह है कि तकरीबन ढाई सौ करोड़ रूपये के इस घोटाले का आरोप यूनिवर्सिटी के टीचर्स व दूसरे कर्मचारियों पर ही लगा है। वीसी रतन लाल हांगलू ने इस बारे में पीएम नरेंद्र मोदी के साथ ही राष्ट्रपति व दूसरे ज़िम्मेदार लोगों को न सिर्फ डेढ़ सौ पन्नों के सबूत के साथ शिकायती चिट्ठी भेजी है, बल्कि उनसे इस मामले की जांच देश की सबसे बड़ी एजेंसी सीबीआई से कराए जाने की भी अपील की है।इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक अरसे से जारी बवाल और गतिरोध के बीच इस बार कुलपति रतन लाल हांगलू खुद सामने आए हैं वो भी सबूत के साथ.....। सबूत विश्वविद्यालय में बीते 10 सालों में हुए 250 करोड़ के घोटाले के हैं, वीसी साहब ने दावा किया है कि इस घोटाले में युनिवर्सिटी टीचिंग और नॉन टीचिंग स्टाफ दोनों शामिल है। वीसी साहब ने बताया कि कैसे बीते दस सालों में विश्वविद्यालय में 250 करोड़ रुपये की लूट हुई है। 

 
 
प्रोफेसर रतन लाल हांगलू ने बताया कि जुलाई 2005 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला जिसके बाद हर साल विश्वविद्यालय को करोड़ों-अरबों रुपये की ग्रांट मिलनी शुरू हुई लेकिन ये पैसा भ्रष्टाचारियों की जेब मे जाने लगा और इस लूट में सबसे बड़े हिस्सेदार वो बने जिनका कैम्पस के अंदर और बाहर सबसे ज्यादा संम्मान है वो विश्वबिद्यालय के प्रोफेसर है।
कुलपति के अनुसार ऐसे किया गया घोटाला - 
विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ने गलत तरीके से पे (सैलरी) का फिक्सेशन करवाकर विश्वविद्यालय को 200 करोड़ का चूना लगा दिया।
विश्वविद्यालय के टीचिंग और नान टीचिंग स्टाफ ने करीब 35 करोड़ रुपये लोन और एडवांस के रूप में ले लिए और हज़म कर गए, इनमे से कई तो रिटायर्ड भी हो चुके हैं।
 
9 करोड़ 12 लाख रुपये करेस्पांडेंट कोर्सेज के एम्प्लॉई की सैलरी के रूप में निकाल लिए गए जबकि साल 2005 में विश्वविद्यालय के केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद से वो इलाहाबाद विश्वविद्यालय का हिस्सा नही रहे।
युनिवर्सिटी के अलग-अलग विभागों ने कई प्रोजेक्ट्स के लिए 42 लाख रुपये ले लिए लेकिन प्रोजेक्ट का क्या हुआ, किसी को नही पता।
विश्वविद्यालय की तरफ से कई मद में आवंटित किए जाने वाले पैसों की सीमा से 10 से 20 गुना पैसा ले लिया गया जिसका कोई हिसाब नही है।
जिस काम के लिए 20 लाख रुपये की सीमा तय थी उसके लिए 2.19 करोड़ रुपये ले लिए ।
जिस मद में यूनिवर्सिटी की तरफ से पैसे देने की कोई व्यवस्था नही थी उसके लिए भी 2.12 करोड़ रुपये ले लिए गए।
सबसे हैरानी की बात ये है कि यूनिवर्सिटी प्रोफेसर और ऑफिसर्स ने 78.28 लाख रुपये हवाई यात्रा (LTC ) के मद में विश्वविद्यालय से ले लिया लेकिन उसके कोई रिकार्ड विश्वविद्यालय को नही सौंपा। ये एक नए तरह का फ्रॉड था।
 
वीसी साहब का कहना है कि मामला सिर्फ इतना भर ही नहीं है, विश्वविद्यालय में हालात इतने खराब हैं कि भ्रष्टाचार की वजह से बीते तीन दशकों से यहां पर सिस्टेमेटिक फेलियर और पॉलिसी पैरालिसिस की स्थिति है। 
30 दिसंबर 2015 को जब उन्होंने विश्वबिद्यालय के कुलपति का चार्ज लिया तभी उन्होंने तय कर लिया था कि विश्वविद्यालय को इस स्थिति से बाहर निकालेंगे लेकिन उन्हें पद से हटाने के लिए साजिश के तहत विश्वविद्यालय में लगातार बवाल, तोड़फोड़ और अस्थिरता पैदा की जाती रही है जिसके लिए छात्रों का इस्तेमाल भी किया गया।
 
31 जुलाई 2017 को प्रधानमंत्री को लिखे 3 पेज की कॉपी उन्होंने एमएचआरडी और भारत के राष्ट्रपति को भी भेजी है। वीसी साहब ने अपने आरोपों के सबूत के रूप में 150 पेज का दस्तावेज भी पीएमओ को भेजा है। उनका कहना है कि ये सबूत पर्याप्त हैं भ्रष्टचार के खिलाफ करवाई के लिए। 
वीसी ने 17 जुलाई को सीएजी को पत्र लिख कर विश्वविद्यालय के बीते 12 सालों का ट्रांजिट ऑडिट का अनुरोध भी किया है वो कहते हैं कि ये भ्रष्टाचार के खिलाफ आरपार की लड़ाई है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय कभी पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड कहलाता था अब भ्रष्टाचारियों का ऑक्सफ़ोर्ड बन चुका है। यहां जरूरत भ्रष्टाचारियों के लिए सख्त करवाई की है, ताकि विश्वविद्यालय को उसकी खोई हुई गरिमा वापस मिल सके जिसका वादा प्रधानमंत्री ने 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान इलाहाबाद की एक रैली में किया था।

Update on: 05-08-2017

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