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सूबे के कई प्राइमरी स्कूल राम भरोसे

देहरादून। उत्तराखण्ड राज्य में सरकारी सिस्टम कई जगह राम भरोसे चल रहा है, तो वहीं बच्चों की प्राईमरी शिक्षा पर सरकार द्वारा ध्यान न दिये जाने से जहां बच्चों की संख्या घटने के मामले प्रकाश में आये हैं तो वहीं पर बहुत कम बच्चों अथवा छात्रों की संख्या पर दो से ज्यादा अध्यापक होने के कारण स्थिति बड़ी सोचनीय एवं विकट रूपी लगती है। प्रदेश के अन्दर पिछले करीब डेढ़ दशक में प्राईमरी स्कूलों पर जिस प्रकार से अन्याय का साया रहा है और मासूमों को शिक्षा देने में लापरवाहियां हुई हैं, वह किसी से भी छिपा हुआ नहीं हैं। पहाड़ में कई प्राईमरी पाठशालाएं ऐसी हैं जिनमें काफी कम बच्चों पर दो या दो से अधिक अध्यापकों को तैनात किया गया तथा वहां की किसी भी दृष्टि से सरकार व शासन-प्रशासन ने सुध लेना गवारा ही नहीं समझा।

मिली जानकारी के अनुसार, आरटीई 2009 के मानक पर नजर डाली जाए तो प्राईमरी स्कूलों में 60 तक छात्र संख्या वाले स्कूलों में दो शिक्षक रखे जाते हैं, 61 से 90 तक की संख्या पर तीन शिक्षक, 91 से 120 तक पर चार शिक्षक, 121 से 150 पर 5 शिक्षक के साथ ही इससे अधिक की छात्र संख्या पर अधिक शिक्षक तैनात करने के मानक है। सरकार ने यह मान लिया है कि इन विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की पदोन्नति, स्थानान्तरण, सेवानिवृत्ति आदि के कारण विद्यालयवार प्रतिवर्ष छात्र-शिक्षक का अनुपात प्रभावित होता रहता है।

उत्तराखण्ड में इन पाठशालाओं की स्थिति ऐसी कही जा सकती है कि मौजूदा व्यवस्था से राज्य सरकार जहां सुधारात्मक कदम उठाने का समय नहीं निकाल पा रही है तो वहीं सरकारी खजाने पर बोझ पड़ रहा है। हैरानी की बात यह है कि राज्य के अन्दर 77 विद्यालय ऐसे हैं जहां पर 20 से कम छात्र संख्या पर दो से अधिक शिक्षक तैनात हैं। हालांकि सूबे की नई सरकार ने इस दिशा में ठोस सकारात्मक कदम उठाने शुरू कर दिये हैं। इस दिशा में सरकार की गंभीरता दिखाई भी दे रही हैं। सरकार कई प्राईमरी स्कूलों को बंद कराकर शेष स्कूलों में ही आवश्यकता के अनुसार गुरूजनों की तैनाती कराने की दिशा में अपने कदम उठा रही है, ताकि मासूमों की शिक्षा एवं उनके भविष्य पर बेहतर ध्यान दिया जा सके।

Update on: 17-06-2017

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