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घरेलू कामगार के लिए सरकार बनाए कानून

देहरादून। हिमाद के निदेशक डीएस पुंडीर ने घरेलू कामगार, असंगठित क्षेत्र का निर्माण श्रमिकों हिम में कानून बनाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार इस विषय में जल्द ही कार्यवाही करे। प्रेस क्लब में पत्रकारो से बातचीत करते हुए श्री पुण्डीर ने कहा कि  उत्तराखण्ड में हजारों की संख्या में ऐसी अंशकालिक, पूर्णकालिक, कुशल-अर्द्धकुशल, अकुशल घरेलू कामगार हैं जिनके काम करने की स्थितियों, सेवाशर्तों, सामाजिक सुरक्षा आदि को लेकर कोई कानून या शासनादेश तक मौजूद नहीं है।

के बाद दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा हैं और इसमें 90 फीसदी कामगार महिलाएं व बच्चियां हैं जो समाज के सबसे निचले तबके-अनुसूचितजाति व जनजाति से आती हैं। हाड़-तोड़ मेहनत करने वाली यह बड़ी आबादी घोर गरीबी, अपमान, उत्पीडऩ, उपेक्षा और अनिश्चितता का जीवन जीने को मजबूर हैं।  तमाम सुझावों और दबावों के बावजूद केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर घरेलू कामगारों के लिए कानून बनाने की दिशा में अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।

सरकार के सामने ऐसे कानून के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले दो विधेयक के मसौदे क्रमश: 2008 व 2010 में प्रस्तुत किए गए पर सरकार ने उन पर कोई निर्णय नहीं लिया। केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों द्वारा घरेलू कामगारों के हित में कानून बनाने के दिशा-निर्देश हेतु जो मसौदा राष्ट्रीय नीति तैयार की, उसे भी अन्तिम रूप नहीं दिया जा सका। यही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सौवें सम्मेलन में साल 2013 में घरेलू कामगारों से सम्बन्धित जो कन्वेंषन पारित हुआ, उसकी भी भारत सरकार ने अभी तक अभिपुष्टि  नहीं की है।

असंगठित कामगार अधिकार मंच की सदस्य दीपा ने बताया कि अभी हाल ही में  अन्य राज्यों ने भी घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के तहत शामिल किया है और अक्टूबर 2016 में असंगठित क्षेत्र कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम की नियमावली भी बना ली है जिसमें घरेलू कामगारों को शामिल किया गया है।

हम राज्य सरकार से माँग करते हैं कि वह उत्तराखण्ड के घरेलू कामगारों के हित में अविलम्ब एक कानून बना कर उन्हें आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा कानूनी तौर पर प्रदान करे और पूरे देष के राज्यों के सामने एक नजीर पेश करे।

असंगठित कामगार अधिकार मंच की सदस्य सोनम गुप्ता ने कहा कि यह बात गौर करने लायक है कि घरेलू कामगारों में 95 प्रतिशत से भी अधिक आबादी महिलाओं की है और वे स्त्री होने के नाते भी कई तरह के उत्पीडऩ, सामाजिक-आर्थिक पराधीनता व सामाजिक असुरक्षा की शिकार हैं। इस मौके पर असंगठित कामगार अधिकार मंच की सदस्य अजय रावत भी मौजूद रहे।

Update on: 17-06-2017

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