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न्याय मंदिरों की तरंगे

अपराध नियन्त्रण में मृत्युदण्ड की भूमिका 


सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री मारकण्डेय काटजू तथा श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्रा की खण्ड पीठ ने सुरेन्द्र कोहली बनाम उत्तर प्रदेश नामक मुकदमें ख्2011 (2) ए. डी. (एस. सी.) 606, में नोएडा के दुर्दान्त अपराधी सुरेन्द्र कोहली को दी गई मृत्यु दण्ड की सजा को पुष्ट तो कर दिया है परन्तु आज स्वयं भारत के सामने मृत्युदण्ड को लेकर एक उलझन भरी स्थिति खड़ी हो गई है। 
 
पहले एक नजर सुरेन्द्र कोहली के कारनामों पर सुरेन्द्र कोहली नोएडा के सेक्टर 31 में महेन्द्र सिंह के घर नौकरी करता था। लम्बे समय से नोएडा में बच्चों विशेष रूप से लड़कियों के लापता होने की घटनाएं सामने आ रही वह किसी बहाने छोटी उम्र की लड़कियों को लालच से घर के अन्दर बुला लेता था उनकी हत्या गला दबाकर करने के बाद उनसे काम वासना पूरी करता और बाद में उन्हें काटकाट कर पकाकर मांस खाने का स्वाद लेता था लड़कियों की हिड्डयाँ तथा कपड़े घर के पीछे सुनसान गली के नाले में डाल देता था। 
 
अपराधी मानसिकता की विचित्रता का अनुमान लगाना भी कोई सरल कार्य नहीं है। परन्तु एक बात निश्चित है कि हर अपराधी कानून के शिकंजे से डरता अवश्य है अपराधी कितनी ही रिश्वते बांट ल,े पुलिस, जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कहीं न कहीं हर अपराधी को नकेल जरूर डल जाती है। 
परन्तु भारत की राजनीति ने अपराध जगत में विशेष रूप से मृत्युदण्ड भोगे अपराधियों को तो एक विशेष प्रसन्नता देने का प्रयास किया है हाल ही में मुम्बई उच्च न्यायालय ने जब मुम्बई आतंकवादी हमले के एक मात्र जीवित आतंकवादी अजमल कसाब को मृत्युदण्ड की पुष्टि की तो आर्थर रोड जेल में बैठा कसाब मुस्कुरा रहा था और वीडियो कान्फ्रेंस के जरिए उसकी वह मुस्कुराहट उच्च न्यायालय के उस कक्ष में दिखाई दे रही थी जहाँ दो न्यायाधीशों की खण्ड पीठ मृत्यु दण्ड की पुष्टि का निर्णय सुना रही थी। 
 
इस आतंकी मुस्कुराहट के पीछे भाव समझने का प्रयास करें तो समझ आयेगा कि जब इस देश की पार्लियामेंट पर हमला करने में शामिल आतंकवादी अफजल को फांसी देने की हिम्मत भारत के नपुंसक नेताओं में नहीं है तो एक होटल पर हमला करने में शामिल आतंकवादी को फांसी कैसे दी जा सकती है। शायद नोएडा का सुरेन्द्र कोहली भी इसी कारण भय से मुक्त मुस्कुरा रहा होगा कि जब पार्लियामेंट वाले अफजल गुरु और ताज होटल में 166 नागरिकों और 3 बड़ेबड़े पुलिस अफसरों को मारने वाले अजमल कसाब को फांसी नहीं दी जा सकती तो केवल पन्द्रह बीस लड़कियों से काम वासना पूरी करने और उनका मांस खाने के बदले मुझे फांसी क्यों मिलेगी जब पन्द्रह बीस लड़कियों की इज्जत आवरू और जान भारत के नेताओं के लिए कोई मायने नहीं रखेगी तो जीवन में एक दो बार कत्ल करने वालों को तो कुछ भी चिन्ता नहीं रहेगी। राजीव गाँधी के हत्यारों को आज तक मृत्युदण्ड की सजा लागू नहीं की जा सकी । खालिस्थान लिबरेशन फोर्स का देवेन्द्र सिंह भुल्लर भी तिहार जेल में मृत्युदण्ड के भय में जी रहा है क्योंकि भुल्लर ने दिल्ली के यूथ कांग्रेस कार्यालय पर हमला करके कईयों की जान ली थी। तमिलनाडु के चन्दन तस्कर विरप्पन के चार सहयोगियों को भी मृत्युदण्ड दिया जाना लम्बित है। पंजाब के कई उग्रवादी भी इसी प्रकार मृत्युदण्ड सजा के दिन जेलों में ही काट रहे हैं। गुजरात के गोदरा रेल अग्नि काण्ड में दर्जनों तीर्थ यात्रियों की मृत्यु के दोषी ग्यारह मुसलमानों को भी हाल ही में मृत्युदण्ड की सजा सुनाई गई है परन्तु विडम्बना की इस देश की न्यायिक व्यवस्था अपने निर्णय को लागू करवाने में लाचार है। 
 
दूसरी तरफ एमनेस्टी इण्टरनेशनल सहित भारत के भी कई तथाकथित मानवाधिकार संगठनों के द्वारा समयसमय पर मृत्युदण्ड की सजा को तो समाप्त करने की ही मांग उठाई जाती रही है। भारत में स्वतन्त्रता के बाद 1947 से अब तक केवल 40 और 50 के बीच मृत्युदण्ड लागू किए गए हैं। 2004 में धनंजय नामक बलात्कारी कातिल को मृत्युदण्ड लागू किया गया था। इसके अतिरिक्त अब तक सैकड़ों एसे निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए हैं जिनमें मृत्युदण्ड की सजा सुनाई गई परन्तु उन निर्णयों के विरूद्ध दया याचिका भारत के राष्ट्रपति या राज्यों के राज्यपालों के पास विचाराधीन है। संविधान के अनुच्छेद 72 तथा 161 के तहत राष्ट्रपति तथा राज्यपालों को दया याचिका पर निर्णय के विशेषाधिकार दिए गए हैं। परन्तु ऐसा कोई नियमकानून नहीं है जो इन निर्णयों पर समय सीमा का बन्धन लगाता हो। राष्ट्रपति को केन्द्र सरकार की सलाह से ही निर्णय लना पड़ता है । केन्द्र सरकार की सलाह को अनदेखा करके राष्ट्रपति भी निर्णय नहीं ले सकता। कहने को ये राष्ट्रपति को न्यायिक कार्य है परन्तु न्यायिक प्रक्रिया की झलक लेशमात्र भी इसमें नजर नहीं आती। राष्ट्रपति दया याचिका रद्द कर दें तो याचिका कर्ता को उन कारणों का भी पता नहीं लग सकता जिस आधार पर उसकी याचिका रद्द हो गई। राष्ट्रपति यदि याचिका स्वीकार करके मृत्युदण्ड माफ कर दे तो अन्य याचिका कर्ताओं को याचिकाएं तैयार करने में कोई सहायता नहीं मिलेगी। ये हैं दया याचिकाओं की प्रथम दृष्टया अन्याय पूर्ण प्रक्रिया। 
 
मृत्युदण्ड के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र भी लामबंद है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने दिसम्बर 2007 में एक प्रस्ताव पारित करके मृत्युदण्ड के प्रावधानों को स्थगित रखने की अपील की है। वैसे भारत ने इस प्रस्ताव के विरूद्ध मत दिया था। चीन ने तो इस प्रस्ताव के बावजूद मृत्युदण्ड लागू करने में सारे संसार में प्रथम स्थान प्राप्त कर रखा है। वर्ष 2009 में चीन में लगभग 1000 अपराधियों पर मृत्युदण्ड लागू किया था। अमेरिका भी मृत्युदण्ड की सजा लागू करने वाले देशों में पांचवें स्थान पर है। 
मृत्युदण्ड का विरोध करने वाले लोग अपराधियों के मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं। उनका कहना है कि राज्य को किसी व्यक्ति की जान लेने का अधिकार नहीं है। परन्तु इन दोनों तकोर्ं के पीछे लेशमात्र भी दम नजर नहीं आता। ये सभी संगठन अपराध पीड़ितों के मानवाधिकारों के प्रश्न पर चुप क्यों हैं? उन परिवारों के मानवाधिकारों की सुध कौन लेगा जिनके जवान आदमी मृत्यु की भेंट च़ा दिए जाते हैं छोटीछोटी अबोध बालिकाओं और जवान लड़कियोंको वासना का शिकार बनाया जाता है? देश में ब़ता अपराध ग्राफ और आतंकवाद का साया इन तथाकथित मानवाधिकारों की चिन्ता का विषय है ही नहीं। इन्हें इस बात का भी ज्ञान नहीं है कि अपराधों की रोकथाम में दो ही सिद्घान्त लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं। प्रथम तो नागरिकों के अपराधी बनने से पूर्व ही उनके चरित्र निर्माण के प्रयासों को शिक्षा व्यवस्था और धार्मिक संस्थाओं का अभिन्न अंग बनाना चाहिए। दूसरा जो नागरिक अपराध मे शामिल हो चुका हो उनके साथ दण्ड व्यवस्था द्वारा निर्धारित सलूक जल्द से जल्द किया जाना चाहिए जिससे अन्य नागरिकों को अपराधी प्रवृत्ति से विमुख करने का वातावरण समाज में तैयार हो सके। दुख है कि इन दोनों सिद्घान्तों पर हमारे देश की शासन व्यवस्था कमजोर साबित होती रही है। 
 
प्रथम उपाय अर्थात अपराधी बनने से पूर्व चरित्र निर्माण का अभियान तो हमने मूव संस्था की स्थापना से प्रारम्भ कर दिया है। कई अन्य धार्मिक और शैक्षणिक संगठन भी अपनेअपने स्तर पर यह कार्य करते रहते हैं। परन्तु दूसरा उपाय अर्थात दण्ड व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने का कार्य तो केवल सरकारों को ही करना है। अदालतों को इस कार्य मं महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। यदि सरकारों को दण्ड लागू करने के कार्य में कोई असमंजस हो तो वे सारे देश में इस विषय पर प्लेबसाईट (जनमन) करवा सकती है। इण्टरनेट पर करवाए जा रहे एक सर्वेक्षण में 62 प्रतिशत लोक मृत्युदण्ड लागू करने के पक्ष में हैं, 32 प्रतिशत लोग विपक्ष में हैं और 6 प्रतिशत उदासीन हैं।
 
>> विभोर त्रिखा

Update on: Thursday, March, 24, 2011, 15:26

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